संपादकीय,
बेरोज़गार युवाओं का निवेदन,
मुख्यमंत्री मोहन यादव जी
विचार करें।
बंद रेत खदानों को पढ़े-लिखे बेरोजगारों को क्यों नहीं देती सरकार?
नीलामी में स्नातक-स्नातकोत्तर युवाओं के लिए आरक्षण या प्राथमिकता की व्यवस्था से कम हो सकती है बेरोजगारी
विदिशा। जिले में बंद पड़ी रेत खदानों को लेकर अब रोजगार और बेरोजगारी का मुद्दा भी सामने आ रहा है। बड़ी संख्या में स्नातक एवं स्नातकोत्तर शिक्षित युवा रोजगार की तलाश में हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि रेत खदानों की नीलामी व्यवस्था में ऐसा प्रावधान क्यों नहीं किया जाता, जिससे स्थानीय पढ़े-लिखे बेरोजगार युवाओं को भी वैधानिक रूप से व्यवसाय और स्वरोजगार का अवसर मिल सके।
नीलामी में आरक्षण या प्राथमिकता का हो प्रावधान
सरकार यदि नियमों के दायरे में रेत खदानों की नीलामी में स्थानीय स्नातक एवं स्नातकोत्तर बेरोजगार युवाओं के लिए निर्धारित प्रतिशत में आरक्षण अथवा प्राथमिकता का प्रावधान करे, तो इससे युवाओं को स्वरोजगार का अवसर मिल सकता है। पात्रता, आर्थिक क्षमता, पर्यावरणीय नियमों और खनन कानूनों का पालन अनिवार्य रखते हुए ऐसी व्यवस्था तैयार की जा सकती है।
इससे बड़े ठेकेदारों के साथ स्थानीय छोटे उद्यमियों और शिक्षित युवाओं को भी प्रतिस्पर्धा का अवसर मिल सकता है।
बेरोजगारी के साथ नशे के कारोबार पर भी चिंता
जिले में युवाओं के लिए रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराने की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है। दूसरी ओर नशे के अवैध कारोबार को लेकर भी समय-समय पर शिकायतें और कार्रवाई सामने आती रही हैं। बेरोजगारी और नशे के कारोबार के बीच सीधा संबंध स्थापित करने के लिए स्थानीय आंकड़ों की आवश्यकता है, लेकिन रोजगार सृजन और नशे के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई दोनों प्रशासन के महत्वपूर्ण विषय हैं।
सरकार से सीधे सवाल
◆ रेत खदानों की नीलामी में स्थानीय पढ़े-लिखे बेरोजगारों के लिए आरक्षण या प्राथमिकता क्यों नहीं?
◆ स्नातक-स्नातकोत्तर युवाओं को प्रशिक्षण देकर वैधानिक खनन व्यवसाय से क्यों नहीं जोड़ा जा सकता?
◆ खनिज से मिलने वाले राजस्व का एक हिस्सा स्थानीय रोजगार और कौशल विकास पर खर्च क्यों नहीं किया जाता?
◆ अवैध रेत उत्खनन और परिवहन पर कितनी कार्रवाई हुई?
◆ नशे के अवैध कारोबार की रोकथाम के लिए प्रशासन की क्या कार्ययोजना है?
रोजगार का अवसर मिले, अवैध कारोबार पर लगे रोक
रेत प्राकृतिक संसाधन है और उसका उत्खनन पर्यावरणीय एवं खनन नियमों के अनुसार ही होना चाहिए। लेकिन इन्हीं नियमों के दायरे में यदि शिक्षित बेरोजगार युवाओं को पारदर्शी तरीके से अवसर देने की व्यवस्था बनाई जाए, तो रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिल सकता है।
अब सवाल यह है कि सरकार प्राकृतिक संसाधनों से राजस्व लेने के साथ-साथ स्थानीय पढ़े-लिखे युवाओं को रोजगार और स्वरोजगार का अवसर देने के लिए क्या कदम उठाती है?
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें