ओबीसी आरक्षण पर भाजपा सरकार को घेरा
अरुण यादव–सचिन यादव बोले—सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक लड़ेंगे लड़ाई
27 प्रतिशत आरक्षण पर सरकार की पैरवी पर उठाए सवाल, प्रदेशव्यापी आंदोलन की चेतावनी
भोपाल/खरगोन,
मध्यप्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के 27 प्रतिशत आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस ने भाजपा सरकार को घेरा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव और पूर्व मंत्री सचिन यादव ने आरोप लगाया कि सरकार की कमजोर पैरवी के कारण पिछड़ा वर्ग को उसके अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। दोनों नेताओं ने कहा कि कांग्रेस ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी और राजनीतिक लड़ाई लड़ेगी।
अरुण यादव का आरोप—अदालत में मजबूती से नहीं रखा पक्ष
पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव ने अपने वीडियो संदेश में कहा कि मध्यप्रदेश में पिछड़ा वर्ग की बड़ी आबादी निवास करती है। ऐसे में 27 प्रतिशत आरक्षण का सवाल लाखों युवाओं के भविष्य और सामाजिक न्याय से जुड़ा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार न्यायालय में ओबीसी का पक्ष प्रभावी ढंग से रखने में विफल रही। यादव ने कहा कि कांग्रेस पिछड़ा वर्ग के अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी ताकत से संघर्ष करेगी। जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट में प्रतिष्ठित अधिवक्ताओं के माध्यम से पक्ष रखा जाएगा।
सचिन यादव ने कमलनाथ सरकार के फैसले का किया उल्लेख
पूर्व मंत्री सचिन यादव ने कहा कि वर्ष 2018 में कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया था। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार इस फैसले को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने में सफल नहीं रही और आरक्षण के समर्थन में आवश्यक तथ्यों को न्यायालय के सामने मजबूती से प्रस्तुत नहीं किया।
सचिन यादव ने कहा कि ओबीसी समाज को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि उसका अधिकार चाहिए। आरक्षण के मुद्दे पर युवाओं के भविष्य के साथ समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा।
प्रदेशव्यापी आंदोलन की चेतावनी
अरुण यादव और सचिन यादव ने कहा कि ओबीसी आरक्षण का मुद्दा सामाजिक न्याय, समान अवसर और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है। कांग्रेस इस विषय को जनता के बीच ले जाएगी और जरूरत पड़ने पर प्रदेशव्यापी आंदोलन करेगी।
दोनों नेताओं ने भाजपा सरकार से जवाबदेही तय करने और पिछड़ा वर्ग के अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की।
नोट: सरकार की पैरवी को लेकर लगाए गए आरोप कांग्रेस नेताओं के बयान पर आधारित हैं। न्यायिक फैसले का सटीक विवरण और उसकी कानूनी स्थिति संबंधित आदेश से सत्यापित किया जाना चाहिए।
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