113 करोड़ का सीवर, जवाबदेही की नाली में कौन बहा?शिवपुरी की सीवर परियोजना पर उठे सवाल, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जताई नाराजगी; - topstarnews

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रविवार, 27 सितंबर 2026

113 करोड़ का सीवर, जवाबदेही की नाली में कौन बहा?शिवपुरी की सीवर परियोजना पर उठे सवाल, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जताई नाराजगी;

*113 करोड़ का सीवर, जवाबदेही की नाली में कौन बहा?*

भोपाल /“न खाऊंगा, न खाने दूंगा” यह सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं था, जनता से किया गया भरोसा था। भरोसा इस बात का कि सरकारी योजनाओं में जनता के पैसे की बंदरबांट नहीं होगी, योजनाएं कागज पर नहीं बल्कि जमीन पर दिखाई देंगी और करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद जनता को यह पूछने की जरूरत नहीं पड़ेगी कि आखिर पैसा गया कहां। लेकिन मध्यप्रदेश के शिवपुरी की करीब 113 करोड़ रुपये की सीवर परियोजना ने इसी भरोसे के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जानकारी अनुसार 
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सवाल किसी विपक्षी दल के नेता ने नहीं उठाया। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने स्वयं शिवपुरी की सीवर परियोजना को लेकर नाराजगी जताई और मामले में भ्रष्टाचार तथा अनियमितताओं की जांच की बात कही है। रिपोर्टों में परियोजना के अपेक्षित परिणाम नहीं देने और भारी राशि खर्च होने के बावजूद सीवर व्यवस्था की समस्या बने रहने की बात सामने आई है।

अब सवाल यह नहीं है कि 113 करोड़ रुपये खर्च हुए या नहीं। सवाल यह है कि 113 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद जनता को मिला क्या?

सरकारी परियोजना का अर्थ सिर्फ टेंडर निकालना, ठेका देना, पाइप बिछाना, बिल पास करना और फाइल बंद कर देना नहीं होता। सरकारी परियोजना का असली परिणाम तब दिखाई देता है जब जनता को सुविधा मिलती है। अगर करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी वही पुरानी समस्या खड़ी है, तो कहीं न कहीं योजना, क्रियान्वयन, निगरानी या भुगतान की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है। और यही वह जगह है जहां “न खाऊंगा, न खाने दूंगा” वाला नारा सरकारी फाइलों के सामने खड़ा दिखाई देता है।

भाई, अगर किसी ने कुछ खाया नहीं तो फिर यह परियोजना इतनी बड़ी समस्या कैसे बन गई? अगर सब कुछ नियम से हुआ तो फिर इसकी विफलता की जिम्मेदारी कौन लेगा? अगर काम सही था तो परिणाम क्यों नहीं आया? और अगर काम सही नहीं था तो उसे सही किसने प्रमाणित किया?यही सवाल जनता पूछ रही है।

किसी परियोजना में भ्रष्टाचार हुआ है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय जांच और कानून की प्रक्रिया से होगा। लेकिन जांच की जरूरत पैदा होना ही अपने आप में गंभीर प्रशासनिक सवाल है। जब केंद्रीय मंत्री स्वयं किसी परियोजना पर सवाल उठाते हैं और जांच की बात सामने आती है तो सरकार की जिम्मेदारी केवल यह कह देने से पूरी नहीं होती कि जांच कराएंगे। जांच हो, उसकी समय सीमा हो, रिपोर्ट सार्वजनिक हो और जिम्मेदारी तय हो यही लोकतांत्रिक जवाबदेही है।

सबसे ज्यादा चिंता उस व्यवस्था की है जिसमें करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद परियोजना की कमियां सामने आती हैं। सवाल है कि जब काम चल रहा था तब निगरानी कौन कर रहा था? जब भुगतान हो रहा था तब गुणवत्ता कौन देख रहा था? जब परियोजना पूरी होने का दावा किया गया तब उसका परीक्षण किसने किया? और अगर तकनीकी खामियां थीं तो उन्हें समय रहते क्यों नहीं पकड़ा गया?

सरकार में फाइलें चलती हैं, नोटशीट बनती है, तकनीकी स्वीकृतियां होती हैं, निरीक्षण होते हैं, माप पुस्तिकाएं बनती हैं और भुगतान जारी होते हैं। इतनी लंबी प्रक्रिया के बाद अगर कोई परियोजना अपेक्षित परिणाम नहीं देती तो जिम्मेदारी सिर्फ उस ठेकेदार की नहीं हो सकती जिसने काम किया। पूरी निगरानी व्यवस्था को जवाब देना चाहिए।

जनता को यह भी समझना होगा कि 113 करोड़ कोई सरकारी खजाने में पड़ा हुआ मुफ्त पैसा नहीं था। यह जनता का पैसा था। किसी किसान ने टैक्स दिया, किसी दुकानदार ने टैक्स दिया, किसी कर्मचारी की कमाई से टैक्स गया, किसी मजदूर ने अप्रत्यक्ष कर दिया। उसी पैसे से सरकार विकास योजनाएं बनाती है। इसलिए जब करोड़ों रुपये की परियोजना पर सवाल उठते हैं तो सवाल सिर्फ अधिकारियों और ठेकेदारों से नहीं, पूरी व्यवस्था से होता है। और यही कारण है कि शिवपुरी का 113 करोड़ वाला मामला केवल शिवपुरी तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

मध्यप्रदेश में सड़कें बनती हैं, पुल बनते हैं, भवन बनते हैं, जल योजनाएं बनती हैं, सीवर योजनाएं बनती हैं। हर जगह जनता का पैसा लगता है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसका पैसा किस तरह खर्च हो रहा है और उस खर्च का परिणाम क्या है। विकास का सबसे बड़ा प्रमाण उद्घाटन का मंच नहीं, जनता को मिली सुविधा है।

फीता कट गया, फोटो खिंच गई, भाषण हो गया और परियोजना की फाइल बंद हो गई यह विकास का प्रमाण नहीं हो सकता। विकास तब है जब शहर की समस्या खत्म हो। और अगर समस्या खत्म नहीं हुई तो सवाल पूछना ही पड़ेगा।

शिवपुरी के मामले में अब सरकार को बयानबाजी से आगे जाना होगा। अगर भ्रष्टाचार के आरोप हैं तो जांच हो। अगर तकनीकी गलती है तो जिम्मेदारी तय हो। अगर ठेकेदार दोषी है तो अनुबंध के मुताबिक कार्रवाई हो। अगर अधिकारियों की निगरानी में चूक हुई है तो उन पर जवाबदेही तय हो। और अगर किसी स्तर पर सरकारी धन का दुरुपयोग साबित होता है तो जनता का पैसा वापस लेने की प्रक्रिया भी सामने आनी चाहिए।

क्योंकि केवल नई डीपीआर बनाकर पुरानी कहानी को दफन कर देना समाधान नहीं है। पुराने 113 करोड़ का हिसाब चाहिए। यह पता चलना चाहिए कि पैसा कहां गया, किसे भुगतान हुआ, किस काम के लिए हुआ और उस काम का परिणाम क्या निकला।

सरकार यदि सचमुच पारदर्शिता में विश्वास करती है तो उसे इस मामले की पूरी रिपोर्ट जनता के सामने रखनी चाहिए। आखिर जिस पैसे का इस्तेमाल हुआ, वह जनता का था और जनता को उसके इस्तेमाल का हिसाब मांगने का पूरा अधिकार है।

विडंबना देखिए कि एक तरफ सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े-बड़े संकल्प दोहराती है और दूसरी तरफ उसी व्यवस्था में करोड़ों रुपये की परियोजनाएं सवालों के घेरे में आ जाती हैं। ऐसे में जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर समस्या कहां है नीति में, निगरानी में, सिस्टम में या उन लोगों में जिन्हें सिस्टम की रखवाली करनी थी? और यदि जवाब आता है “पता करेंगे”, तो जनता का अगला सवाल होगा कब तक पता करेंगे? क्योंकि जनता को अब केवल जांच का आश्वासन नहीं चाहिए।

जनता को जांच का परिणाम चाहिए। उसे यह जानना है कि गलती हुई तो किससे हुई, नुकसान हुआ तो किसने किया और सरकारी धन गया तो उसकी भरपाई कौन करेगा।

“न खाऊंगा, न खाने दूंगा” की असली परीक्षा भाषणों में नहीं होती। उसकी परीक्षा ऐसी ही फाइलों में होती है। जहां करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हों और परिणाम सवालों में खड़ा हो।

शिवपुरी की 113 करोड़ रुपये की सीवर परियोजना अब सिर्फ एक परियोजना नहीं रही। यह सरकारी खर्च, प्रशासनिक निगरानी और राजनीतिक जवाबदेही की परीक्षा बन चुकी है।इसलिए अब जनता को एक और उद्घाटन नहीं चाहिए।

उसे 113 करोड़ का पूरा हिसाब चाहिए। और सरकार से बस इतना कहना है पता करिए जरूर, लेकिन पता लगने के बाद जनता को भी बताइए।क्योंकि सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि सीवर लाइन क्यों नहीं चली। सवाल यह है कि जनता का 113 करोड़ रुपया जिस रास्ते से गया, उस रास्ते की निगरानी करने वाला आखिर कौन था?

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